Thursday, October 1, 2026

‘दिमागी नक्सल होने पर गर्व’: पीएम मोदी की टिप्पणी पर पी. चिदंबरम का पलटवार

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कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘दिमागी नक्सल’ टिप्पणी पर कटाक्ष किया। मोदी ने लाल किले से ऐसे लोगों की पहचान कर उन्हें अलग-थलग करने का आह्वान किया था।

वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘दिमागी नक्सल’ टिप्पणी पर कटाक्ष करते हुए कहा है कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ होने पर गर्व है।

चिदंबरम की यह प्रतिक्रिया प्रधानमंत्री मोदी के स्वतंत्रता दिवस संबोधन के एक दिन बाद आई। उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखा, “मुझे दिमागी नक्सल होने पर गर्व है।”

मोदी ने ‘दिमागी नक्सलों’ से सतर्क रहने को कहा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2026 को लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा कि देश ने जंगलों में सक्रिय सशस्त्र नक्सलवाद को समाप्त करने की दिशा में सफलता हासिल की है। हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि माओवादी विचारधारा से प्रभावित लोग अब भी हिंसा और अराजकता को बढ़ावा देने के अवसर तलाश रहे हैं।

मोदी ने ऐसे लोगों के लिए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल किया और नागरिकों से उनकी पहचान कर उन्हें अलग-थलग करने का आह्वान किया।

प्रधानमंत्री ने आरोप लगाया कि माओवादी मानसिकता वाले लोग वर्षों तक सत्ता के गलियारों में सक्रिय रहे, सरकारी समितियों में सलाहकार बने और सार्वजनिक नीतियों को प्रभावित करते रहे। उन्होंने कहा कि इस चुनौती को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए।

नक्सली हिंसा पर क्या बोले प्रधानमंत्री?

अपने संबोधन में मोदी ने कहा कि दशकों तक चले नक्सलवाद और माओवादी हिंसा ने लाखों युवाओं के जीवन और आकांक्षाओं को प्रभावित किया है। उनके अनुसार, इस संघर्ष में 3,500 से अधिक पुलिस और सुरक्षाकर्मी मारे गए।

प्रधानमंत्री ने कहा कि नक्सलवाद ने देश के बड़े भूभाग और वहां रहने वाली आबादी को बंदूक के बल पर अपनी गिरफ्त में रखा। उन्होंने दावा किया कि उनकी सरकार ने 2014 में सत्ता संभालने के बाद नक्सलवाद को समाप्त करना प्राथमिकता बनाया।

मोदी के मुताबिक, जिन क्षेत्रों में कभी नक्सली हिंसा और रक्तपात आम था, वहां अब विकास, विश्वास और सरकारी प्रयासों का ‘तिरंगा’ लहरा रहा है। सरकार का कहना है कि सुरक्षा अभियानों और विकास योजनाओं के संयुक्त प्रभाव से माओवादी हिंसा में कमी आई है।

चिदंबरम की प्रतिक्रिया से राजनीतिक विवाद तेज

चिदंबरम की संक्षिप्त प्रतिक्रिया ने प्रधानमंत्री द्वारा इस्तेमाल किए गए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। उनकी टिप्पणी को सरकार के आलोचकों के लिए ऐसे व्यापक राजनीतिक लेबल के इस्तेमाल पर व्यंग्य के रूप में देखा जा रहा है।

हालांकि, चिदंबरम ने अपनी पोस्ट में इस शब्द के अर्थ या सशस्त्र माओवाद पर अपने रुख का विस्तृत स्पष्टीकरण नहीं दिया। इसलिए उनकी संक्षिप्त टिप्पणी से आगे कोई निश्चित निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

पूर्व गृह मंत्री के रूप में चिदंबरम के कार्यकाल के दौरान केंद्र सरकार ने माओवादी हिंसा से निपटने के लिए कई सुरक्षा अभियान चलाए थे। इस पृष्ठभूमि के कारण प्रधानमंत्री की टिप्पणी पर उनकी प्रतिक्रिया ने अतिरिक्त राजनीतिक महत्व हासिल कर लिया है।

असहमति और हिंसा के समर्थन के बीच अंतर

यह विवाद एक व्यापक लोकतांत्रिक प्रश्न को सामने लाता है—सरकार की वैध आलोचना, किसी विचारधारा के प्रति सहानुभूति और सशस्त्र हिंसा के समर्थन के बीच अंतर किस आधार पर निर्धारित किया जाना चाहिए?

एक ओर केंद्र सरकार माओवादी हिंसा और उसके वैचारिक समर्थकों को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बता रही है। दूसरी ओर, आलोचकों की चिंता है कि ‘दिमागी नक्सल’ जैसे अस्पष्ट शब्दों का इस्तेमाल शांतिपूर्ण राजनीतिक असहमति या बौद्धिक आलोचना को बदनाम करने के लिए किया जा सकता है।

प्रधानमंत्री की चेतावनी और चिदंबरम के पलटवार के बाद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राजनीतिक असहमति और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन को लेकर बहस तेज होने की संभावना है।

प्रधानमंत्री के संबोधन और संबंधित घटनाक्रम की जानकारी Associated Press की रिपोर्ट में भी उपलब्ध है।

मूल रिपोर्ट Hams Live News में प्रकाशित की गई थी।

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